भगवान श्री शनिदेव का प्राकट्य एवं पौराणिक कथा
स्कंद पुराण एवं सौर पुराण के अनुसार, भगवान शनिदेव का प्राकट्य सूर्यदेव और माता छाया (संवर्णा) के पावन तप से हुआ। गर्भकाल के दौरान माता छाया भगवान देवाधिदेव महादेव की कठोर तपस्या में लीन थीं। कठिन उपवास और सूर्यदेव के प्रचंड ताप के प्रभाव से गर्भस्थ बालक का वर्ण श्याम (काला) हो गया।
बालक के प्राकट्य उपरांत जब सूर्यदेव ने उनके श्याम वर्ण को देखा, तो उन्होंने संदेह व्यक्त किया। इस पर बालक शनिदेव ने अपने पिता की ओर क्रोधपूर्ण दृष्टि डाली, जिससे सूर्यदेव का तेजस्वी शरीर भी कुछ समय के लिए निष्प्रभ (काला) हो गया। आगे चलकर शनिदेव ने गोकर्ण तीर्थ में भगवान शिव की युगों तक घोर तपस्या की। उनकी निष्ठा, तप और अडिग न्याय-भाव से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें नवग्रहों में सर्वोच्च दंडाधिकारी एवं कर्मफलदाता का पद प्रदान किया।
श्री हनुमान जी का अभय वरदान
रामायण कालीन कथा के अनुसार, जब लंकापति रावण ने नवग्रहों को अपने सिंहासन के नीचे उल्टा बंदी बना रखा था, तब श्री हनुमान जी ने लंका दहन के समय शनिदेव को रावण के बंधन से मुक्त कराया। युद्ध के कारण शनिदेव के शरीर में हुई असहनीय पीड़ा को शांत करने हेतु पवनपुत्र ने उन पर सरसों का तेल लगाया। शनिदेव ने अत्यंत प्रसन्न होकर वचन दिया कि "जो भी भक्त श्री हनुमान जी की आराधना करेगा, सुंदरकांड/चालीसा का पाठ करेगा और मुझ पर भक्तिभाव से तेल अर्पित करेगा, उसे मेरी पीड़ा से सदा मुक्ति मिलेगी।"
भगवान शनिदेव के वरदान अनुसार जो भक्त संकटमोचन श्री हनुमान जी के शरणागत रहते हैं, उन्हें शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के दौरान किसी भी प्रकार का भय अथवा अनिष्ट नहीं सताता। हनुमान जी की भक्ति से नवग्रहों की प्रतिकूलता भी अनुकूलता में बदल जाती है।
शनिदेव न्याय के अधिपति हैं, अतः केवल पूजा ही नहीं बल्कि अपने आचरण को शुद्ध रखना भी अनिवार्य है:

